Saturday, 24 February 2018

नास्तिक व् आस्तिक दोनों ही ईश्वर में प्रबल विश्वासकर्ता है ।

नास्तिक व् आस्तिक दोनों ही ईश्वर में प्रबल विश्वासकर्ता है ।

वह प्रत्येक मानव जो ईश्वर सत्ता को मानता है , उसमे विश्वास व् भक्ति रखता है हम उसे आस्तिक कह देते है।
दूसरा जो किसी अनदेखी शक्ति जिससे वह प्रत्यक्ष न हुआ हो उसपर विश्वास नही करता। वह दृश्य जगत को ही प्रत्यक्ष और सत्य मान, स्वयं पर विश्वास कर आगे बढ़ता है । हम उसे नास्तिक कह देते हैं।
पर इस नास्तिक का उस हठधर्मी से कोई मेल नही जो सब कुछ जान कर भी सिर्फ अपने हठ हेतु ईश्वर या ऐसी किसी शक्ति को नकारता है। वह नास्तिक नही सिर्फ हठी है।
आस्तिक व् नास्तिक दोनों ही समान रूप से आध्यात्मिक विकास को प्राप्त करने के हक़दार होते है। असल में दोनों ही के बीच "विश्वास" की समानता है।
ईश्वर गुणी भी कहलाता है , निर्गुणी भी । वह सकार भी है और निराकार भी अर्थात हमारे विश्वास की दिशा ही सब कुछ तय करती है ।
यह दोनों मार्गों पर जो समानता है "विश्वास" तत्व की , यही तत्व उस ईश्वरीय तत्व का मूल जान पड़ता है।
जिसे विश्वास है, उसकी मनोकामना पत्थर की मूर्तिं भी पूरी कर देती है । जो नही विश्वास करता वो समस्त प्रयासों व् संसाधनों की मौजूदगी के बाद भी असफल हो जाता है ।
अर्थात सफलता का एक मात्र सूत्र "विश्वास" है । अगर हमे विश्वास है की कोई बाह्य सकती ईश्वर है जिससे यह समस्त चराचर जगत गतिमान है तो निश्चित ही हमारे हेतु सृष्टि यही स्वरुप धारण किये रहेगी।
पर जिसे वह शक्ति जिससे समस्त ब्रह्माण्ड के प्रत्येक कण में स्पंदन व्याप्त है उसके  स्वयं में ही स्थित होने का विश्वास हो , वो "ब्रह्मोस्मि" का साधक हो निश्चित ही उसके पूर्ण विश्वास से प्रकति वह तत्व उसमे ही स्थापित कर देगी।
पर सावधान रहना होगा। हम आस्तिक या नास्तिक दोनों ही मार्गों से इस पथ पर चल लक्ष्य तो पा सकते हैं। पर हठ धर्मिता को कभी "विश्वास" रूप में परिवर्तित नही कर सकते। अपितु वह तो उस माया के समान है जो हमारे बुद्धि पर इस निर्वाण अथवा मोक्ष मार्ग के विपरीत का आवरण डाल देगी। फिर हम लाख उद्घोसणा कर ले , लड़ ले सर पटक ले हमे प्राप्त कुछ नही होगा ।

इन दोनों के बीच वही भेद है , जो एक ईश्वर की भक्ति से मोक्ष पाने वाले और स्वयं को सर्वसमर्थ मान साधना मार्ग से निर्वाण अथवा बुद्ध पद प्राप्तकर्ता के बीच है । दोनों का लक्ष्य एक है । अंत में दोनों एक ही स्थान प्राप्त करते हैं। बस फर्क उनके विश्वास स्वरुप में है ।
एक ईश्वर के आकार को पूर्व सुनिश्चित कर के इस पथ पर आगे बढ़ता है और वह सर्व शक्तिमान परमात्मा उसकी भक्ति अनुसार वही रूप धर कर उपस्थित हो जाता है ।
तो दूसरा उस अनजाने पथ भर भयरहित विश्वास से पूर्ण होकर आगे बढ़ता है और उस शक्ति का उसके प्राकृतिक स्वरुप में ही प्रत्यक्ष दर्शन को उद्धत रहता है और उसकी सफलता उसे उस परम् शक्ति से प्रत्यक्ष करवाती है।
यह जानने और मानने के बीच का भेद है । यह जानकारी व् ज्ञान के बीच का भेद है । यह बताई गई बात व् अनुभव के बीच का भेद है ।

यह वही भेद है जो हम यह जानने वाले की यह शरीर नश्वर है और हम शरीर नही अनश्वर आत्मा है  और आत्मा से साक्षात्कार कर चुके आत्मज्ञानी के बीच है।
हम यह जानते तो हैं की  हम आत्मा है देह नही। पर विश्वास नही है चाहे हम ऊपरी रूप जितना भी कह ले की भरोसा तो है, पर भरोसा है नही ।विश्वास क्षीण है क्योंकि इसकी जानकारी है अनुभव नही ।
चोट लगने पर दर्द होगा यह हम सब जानते पर जब तक चोट लगे न उसके दर्द का अनुभव नही कर सकते , ठीक उसी प्रकार जैस आग की ज्वलनशीलता से अनभिज्ञ अभी जल्द ही चलना सीखा बालक आग से भी खेलने को आगे बढ़ सकता है जब तक उसके ज्वलनशीलता का अनुभव न हो वह उससे दूर नही हो पाता।
चोट से पूर्व अनुभव नही होना स्पष्ट करता है की अनुभव साक्षात्कार के बिना सम्भव नही है ।

इन सभी से यह स्पष्ट होता है की विश्वास के लिए साक्षात्कार आवश्यक है । बिना अनुभव अपने जानकारी पर विश्वास नही हो सकता ।

आस्तिक व् नास्तिक दोनों ही भिन्न आध्यात्मिक स्तर है । जो एक ही मार्ग पर  प्रशस्त हैं।
यह स्तर भेद मूर्ति पूजक व् आत्म साधना प्रविष्ट साधक के बीच का भेद हैं।यह भेद जानकारी व् ज्ञान के मध्य का भेद है।
हम सभी को ज्ञात है की वैदिक काल के पूर्वाध में मूर्ति पूजा नही थी । यह निश्चित ही धर्म कमजोर पड़ने व् समाज का आध्यात्मिक स्तर गिरने पर धर्म में प्रविष्ट हुआ होगा।

शुरुवात में साक्षात्कार के आभाव में एक प्रत्यक्ष की आवश्यकता होगी। यही सोच इसे स्थान दिया गया होगा। पर इसका आजतक (दीर्घकाल तक) स्थिर रहना यह अंकित करता है की मानव समाज अभी तक वापस उस अद्यात्मिक स्तर को प्राप्त नही कर सका है ।
दीर्घकाल तक मूर्ति पूजा की परम्परा जारी रहने से  हमारी निर्भरता बढ़ गई। हम आगे बढ़ना भूलते जाएंगे। यह धर्म हानि का भविष्य में कारण बन सकता है । जैसे ईश्वर को खुद से बाहर मूर्ति में खोजते अधिकतर मानव स्वार्थ पूर्ति हेतु ही उनके समक्ष जाते है। ईश्वर वस्तुनिष्ठ अभिलाषा को पूर्ण करने वाली दिव्य शक्ति बन चूका एक बड़े तबके के लियें । तब निश्चित ही स्वयं की दिव्यता से किसी का साक्षात्कार नही हो पाएगा।

तब आत्मा के सत्य से दूर देह ही सत्य कहलाएगी। अज्ञानता ही ज्ञान कहलाने लगेगी।

इस हेतु आत्मचिंतन व् आत्ममंथन आवश्यक है । अपने विश्वास व् जानकारी की परख अनिवार्य है । मूर्ति पूजा को प्रथम सोपान मान क्रमबद्ध रूप से प्राणायाम, साधना, संकल्प , ध्यान व् समाधि के पथ पर अग्रसर होना होगा।
यही भारत में पुनः सनातन धर्म की स्थापना के साथ इसे धरती पर ज्ञान कुञ्ज रूप स्थापित करेगी।